ग़ज़ल

शाम ढले घर वापस आना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?
इज़्ज़त का परचम लहराना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?

वक्त का क्या है, वह तो अपनी धुन में चलता जाता है,
वक्त से अपनी दौड़ लगाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?

सबकुछ रौशन करने वाले बूढ़े तन्हा सूरज का
तारीक़ी में गुम हो जाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?

ख़ुद को सबसे बेहतर साबित करने की सबकी क़ोशिश,
यही क़वायद करते जाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?

तुम से जब मिलता हूं, कुछ मिसरे से ज़हन में आते हैं,
उनकी पूरी ग़ज़ल बनाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?

मैं तुमको चाहा करता हूँ...

तुम्हे पा लूँ, ऐसी चाह नहीं,
चाहूँ भी तो कोई राह नहीं,
बेमक़सद, बेमतलब यूँ ही
मैं तुमको सोचा करता हूँ।

ग़ज़लों की उन्ही किताबों में,
उन सूखे हुए गुलाबों में,
जागी आँखों के ख़्वाबों में
मैं तुमको देखा करता हूँ।

जब साँसें बोझिल होती हैं,
धुंधली हर मंज़िल होती है,
जब दुनिया क़ातिल होती है,
मैं तुमको ढूंढा करता हूँ।

यूँ मुझे नियति पर नहीं यक़ीँ,
कोइ ईश्वर मेरा पूज्य नहीं,
पर ऐसा कुछ है अगर कहीं,
मैं तुमको मांगा करता हूँ।

ये रिश्ता तुम पर भार न हो,
शायद तुमको स्वीकार न हो,
मुझे कहने का अधिकार न हो,
(पर) मैं तुमको 'अपना' कहता हूँ।

मेरा मन

मेरा मन
अनुभवहीन
होने को चिर आनंद में विलीन
उत्सुक सदैव
किन्तु हा, दुर्दैव!
कठोर यथार्थ से अनभिज्ञ
व्यक्तिगत स्वार्थ से अपरिचित
कुटिल भावनाओं
अज्ञात आशंकाओं से
हर क्षण घिरा
फिर भी यह सरफिरा
उल्लासित
उत्साहित
एक समृद्ध अकिंचन
यह मेरा मन।

मेरी पहली कविता

अनंत का विस्तार
अनंत से
अनंत तक,
अर्थात शून्य..

शून्य की सत्ता
अकल्प
अपरिमित,
अनंत..

स्वप्न हमारे
अनंत
अपरिमित,
होने को सभी संभावित,
किन्तु यथार्थ में
शून्य।