मेरी पहली कविता

अनंत का विस्तार
अनंत से
अनंत तक,
अर्थात शून्य..

शून्य की सत्ता
अकल्प
अपरिमित,
अनंत..

स्वप्न हमारे
अनंत
अपरिमित,
होने को सभी संभावित,
किन्तु यथार्थ में
शून्य।

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