शाम ढले घर वापस आना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?
इज़्ज़त का परचम लहराना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?
वक्त का क्या है, वह तो अपनी धुन में चलता जाता है,
वक्त से अपनी दौड़ लगाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?
सबकुछ रौशन करने वाले बूढ़े तन्हा सूरज का
तारीक़ी में गुम हो जाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?
ख़ुद को सबसे बेहतर साबित करने की सबकी क़ोशिश,
यही क़वायद करते जाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?
तुम से जब मिलता हूं, कुछ मिसरे से ज़हन में आते हैं,
उनकी पूरी ग़ज़ल बनाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है ?
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8 comments:
स्वागत है आपका प्रवीण सिंह जी;
आपकी गज़ल बहुत अच्छी है.
प्रवीण जी लिखते रहना भी बेहद जरूरी है , स्वागत है आपका
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bahut sundar likha hai ...
वक्त का क्या है, वह तो अपनी धुन में चलता जाता है,
वक्त से अपनी दौड़ लगाना क्या हर रोज़ ज़रूरी है?
nadi ka astitva tabhi hai jab woh bahati rahati hai nahi to sukh jaati hai waise agar samay ke saath nahi bhago ge to aapka bhi astitva khi jayega ;-)
gazal puri na ho to jisaki shuruvat ki hai woh kain khatam nahi hoti.
अच्छी गजल।
प्रवीण जी निश्चित रूप से ग़ज़ल अभी काफी काम मांग रही है । बहर में कई जगह पर समस्या है पर एक बात कहूंगा आपने प्रयास अच्छा किया है पर बात वही है 'सितारों के आगे जहां और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं ' आपकी ग़ज़ल पर शायद कल टिप्पणी करूंगा आज तो जब आपका संदेश मिला रात हो गई थी । अभी सरसरी तौर पर ही आपकी ग़ज़ल देखी है ।
Excellent Pravin!!
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