एह्सास-ए-जाँ लिखूँ, या सुरूर-ए-क़ज़ा लिखूँ ।
जो ख़ुद ही एक ग़ज़ल हो, अब मैं उसपे क्या लिखूँ॥
इरशाद पे जिसके क़लम उठाई है फिर से,
पहले तो मैं उस ख़ूबरू का शुक्रिया लिखूँ ॥
चाहे न कोइ भी हो, बस इक वो हों मेरे साथ,
फिर तो मैं एक नई तवारिख़-ए-जहाँ लिखूँ ॥
मेहताब से रुख़सार पे ज़ुल्फ़ों के ये बादल,
हट जाएँ ग़र तो उनकी हया का बयाँ लिखूँ॥
यूँ तुमपे तो बहुतों ने लिखा होगा बहुत कुछ,
क़ोशिश है कि हर लफ़्ज़ मैं सबसे जुदा लिखूँ॥
उसकी हर एक अदा से बिखरते हैं रंग सौ,
मुश्किल में हूँ, किस रंग में उसकी अदा लिखूँ॥
तय है कि जिसकी कोई सही इंतिहा नहीं,
फिर क्यों मैं ऎसी दास्ताँ की इब्तिदा लिखूँ?
जो कुछ भी दिल में आया, मैं लिखता चला गया,
अब तुम कहो तो फिर से मैं बाक़ायदा लिखूँ ॥
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6 comments:
उसकी हर एक अदा से बिखरते हैं रंग सौ,
मुश्किल में हूँ, किस रंग में उसकी अदा लिखूँ॥
--बहुत उम्दा, वाह!!
वाह! हर शेर सवा - बल्कि ढाई सेर!
bahut sundar
बहुत बहुत शुक्रिया समीर जी और रवी जी. आप जैसे लोगों का आशीर्वाद पा कर सच में गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ.
जब इब्तेदा इतनी खूबसूरत है तो इन्तहा तक क्या होगा....
बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही है आप ने...लिखते रहिये.
नीरज
धन्यवाद नीरज जी, शुक्रिया महक. क़ोशिश करूंगा कि कम लिखूँ, पर अच्छा लिखूँ.
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