मैं तुमको भूल नहीं पाता

यह कविता मेरे मन में बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध रचना 'तब मैं तुम्हे भूल जाता हूँ' पढ़ते हुए एक प्रतिक्रिया के रूप में जन्मी थी. यूँ मेरी हैसियत तो नही, पर इसे मैं बाबा को ही समर्पित करना चाहूँगा.

हर्षित होकर वर्षाऋतु का
अभिनंदन करते वृक्ष सघन,
काले मेघों का जब प्यासी
धरती करती है आवाहन
श्रावण की नीरव रजनी में,
रह-रह कर जब धीमे-धीमे
पपीहा दारूण स्वर में गाता,
मैं तुमको भूल नहीं पाता

वह अतुल रूप, वह श्याम वर्ण,
मुख पर अव्यवस्थित केश सघन,
वह कृत्रिम क्रोध से भरी हँसी,
पर भेद खोलते धृष्ट नयन
कोमल कपोल, रक्ताभ अधर,
कोकिल समान वह सुमधुर स्वर,
यह चित्र कभी मन में आता,
फिर तुमको भूल नहीं पाता

वैसे तो तुम्हे भुलाने के
जाने कितने ही किये यत्न,
पर तुमसे ध्यान हटा पाने के
व्यर्थ गये सारे प्रयत्न
है याद तुम्हारी आती जब,
संकल्प धरे रह जाते सब,
मैं अपने पर ही झुँझलाता,
अब तुमको भूल नहीं पाता

3 comments:

शोभा said...

है याद तुम्हारी आती जब,
संकल्प धरे रह जाते सब,
मैं अपने पर ही झुँझलाता,
अब तुमको भूल नहीं पाता ॥
बहुत अच्छा लिखा है।

बेवफ़ा said...

धन्यवाद शोभा जी.

Aman Dalal said...

bhaut acha laga padkar